इज्ज़त मसलते हैं हमारी
और
प्यार है तुमसे
कहकर
पुचकारते हैं
ज़िद्द अपनी चलाते हैं
हमे ज़िद्दी बुलाते हैं
मिल ना सकें हैं उमर भर को
अब
बस एक बार
के लिए छटपटाते हैं
एहसासों से परे
शब्दों में उलझे से हैं अब भी
पैनी नोक गहराइयों तक चुभाते हैं
रूठते हैं
मनाते नहीं
हर बार हमपे ही निशाना
साधते हैं
जिन शब्दों में गुम हो
बाहर आओ जनाब
ये धागे वो है जो एहसास बांधते है
और
तुम वो हो
हम वो हैं
जो दिल और धड़कन आपस में
फुंफकारते हैं
दण्डवत लेटकर माफ़ी की चेष्टा करते हुए 🥺
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